Posts

सम्राट अशोक

सम्राट अशोक को “चक्रवर्ती सम्राट” कहा जाता है। चक्रवर्ती सम्राट का अर्थ है सम्राटों का सम्राट। भारत में केवल सम्राट अशोक को ही यह उपाधि मिली थी। सम्राट अशोक भारतीय इतिहास का एक ऐसा पात्र है जिसकी तुलना दुनिया में किसी से नहीं की जा सकती। सम्राट अशोक भारतीय मौर्य साम्राज्य के शासक थे। सम्राट अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया था। सम्राट अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में हुआ था। सम्राट अशोक के पिता राजा बिंदुसार, माता शुभद्रंगी और दादा चंद्रगुप्त मौर्य थे। आचार्य चाणक्य सम्राट अशोक के गुरु थे। अशोक को एक कुशल सम्राट बनाने में आचार्य चाणक्य का बहुत बड़ा योगदान था। अशोक का पूरा नाम देवानाप्रिय अशोक मौर्य था। देवानामप्रिय का अर्थ है देवताओं का प्रिय। देवानामप्रिय का उल्लेख ब्राह्मी लिपि में उल्लिखित रुम्मिनदेई के स्तम्भ में किया गया है। रुम्मिनदेई लेख में स्पष्ट लिखा है कि देवताओं के प्रिय राजा प्रियदर्शी राजा ने अपने राज्याभिषेक के 20 वर्ष पश्चात स्वयं आकर इस स्थान की पूजा की थी। रुम्मिनदेई नामक गाँव लुम्बनी गाँव है जो गौतम बुद्ध (563 ईसा पूर्व) के जन्म स्थान के रूप में प्रसिद्...

अनन्त आकाश

अनन्त आकाश आकाश एक नहीं आकाश और भी हैं। जैसे कि चिदाकाश, महाकाश, घटाकाश ये बाह्याकाश है लेकिन एक आकाश तुम्हारे भीतर भी है। बाहर के आकाश में सारे भौतिक तत्व हैं, चमत्कार हैं, विस्तार है और जीवन का निन्यानवे प्रतिशत समय तुम इसमें बिताते हो जब तक पता चले तब तक बचे हुए एक प्रतिशत को जान नहीं पाते हो और भीतर के आकाश को बिना जाने निकल लेते हो।  इस भीतर के आकाश में तुमने अगर किसी को साथ ले कर जाने की कोशिश की तो तुम प्रवेश द्वार पर ही रोक दिये जाओगे। दूसरी बात और भी है कि सारे साधन संसाधन भी ले जाने की कोशिश की तो वे भी तुम्हें तुरन्त बाहर खींच लावेंगे। वहाँ पैदल जाना है, अकेले जाना है, निर्विचार जाना है, अनाभिलाष जाना है, उन्मुक्त हो कर जाना है।  निर्मानमोहा: जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5 श्रीमद्भगवद्गीता।। जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रह...

च्यवनिका #1 से#9 तक

च्यवनिका #1 (अर्थात् बूँद बूँद टपकन) बूँद #1 टूटता हुआ तारा, आकाश में चमकती बिजली कितनी ही क्षणिक क्यों न हो पर वह दृश्य तो हमारे अन्तर्पट पर लकीरें छोड़  जाती है। इसी तरह तुम आये कुछ पल के लिये मेरे जीवन में और देखो मैं कितना बदल गया हूँ। आकाश में तारा जो टूटा एक चमकती लकीर सी पगडण्डी बना कर छोड़ गया, मेरी मंजिल की राह बन गई है अब वह। बिजली जो चमकी बादलों में, मैंने इस गहन अन्धकार में भी देख लिया कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ ? हाँ,  मेरा प्रियतम अथवा मेरा गुरू हो तुम। वह छूटी हुई चमक मुझ में गुरूसत्ता के रूप में विद्यमान है। तुम व्यक्ति नहीं हो सकते, तुम मेरे भीतर का प्रकाश बन कर बस गये हो। प्रकाश आत्मा का, प्रकाश जो मुझे तमस के महाब्धि में गिरने से बचायगा, प्रकाश जो जीवन में आने वाली निराशाओं से बचाएगा। यह प्रकाश मेरी जिजीविषा का उत्प्रेरण है। प्रकाश जो परमात्मा का ही है जो तुम्हारे दर्पण से हो कर मुझ तक सहज रूप से पहुँच रहा है। ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।श्रीमद्भगवद्गीता 13/18।। मैं उस सद्गुरू को प्रणाम करता हूँ। रामना...

च्यवनिका #1

च्यवनिका  (अर्थात् बूँद बूँद टपकन) बूँद #1  टूटता हुआ तारा, आकाश में चमकती बिजली कितनी ही क्षणिक क्यों न हो पर वह दृश्य तो हमारे अन्तर्पट पर लकीरें छोड़  जाती है। इसी तरह तुम आये कुछ पल के लिये मेरे जीवन में और देखो मैं कितना बदल गया हूँ। आकाश में तारा जो टूटा एक चमकती लकीर सी पगडण्डी बना कर छोड़ गया, मेरी मंजिल की राह बन गई है अब वह। बिजली जो चमकी बादलों में, मैंने इस गहन अन्धकार में भी देख लिया कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ ?  हाँ,  मेरा प्रियतम अथवा मेरा गुरू हो तुम। वह छूटी हुई चमक मुझ में गुरूसत्ता के रूप में विद्यमान है। तुम व्यक्ति नहीं हो सकते, तुम मेरे भीतर का प्रकाश बन कर बस गये हो। प्रकाश आत्मा का, प्रकाश जो मुझे तमस के महाब्धि में गिरने से बचायगा, प्रकाश जो जीवन में आने वाली निराशाओं से बचाएगा। यह प्रकाश मेरी जिजीविषा का उत्प्रेरण है। प्रकाश जो परमात्मा का ही है जो तुम्हारे दर्पण से हो कर मुझ तक सहज रूप से पहुँच रहा है। ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।श्रीमद्भगवद्गीता 13/18।। मैं उस सद्गुरू को प्रणाम ...

#4

च्यवनिका  #4 कौन है जो क्षितिज के पार गया है? क्षिति का अर्थ है- जमीन, धरती, पृथ्वी। एक और अर्थ भी सुना है-निवास स्थान। जो धरती से जन्मा है वह क्षितिज है या हम जहाँ रहते हैं वहाँ से क्षितिज वह काल्पनिक किन्तु सत्य आभासित होने वाली परिधि है जिसके पार हमारी दृष्टि नहीं जा सकती है। क्षितिज के उस पार अथवा हमारे क्षितिज में रह रहे आदमी का भी अपना क्षितिज है। उसके क्षितिज से हमारा क्षितिज टकराता नहीं है। कमाल की बात है कि आदमी चलता है तो हाथ में पकड़े छाते जैसा अपना क्षितिज उसके अपने साथ साथ चलता है।  कभी कभी लगता है अगर परिधि का यह सीमांकन नहीं होता तो मीलों दूर तक हमें दिखाई देता। प्रकृति ने इस तरह की कई सीमाएँ तय की हैं जैसे अगर हम पूरे जोर से चिल्लावें तो यह आवाज कुछ दूर चल कर मर जाती है। अगर आवाज कुछ दूर चल कर न मरती तो यूक्रेन में बम्बार्डमेन्ट करने वाली मिसाइलों की गड़गड़ाहट यहाँ तक आ कर हमारे कान फोड़ देती। पूरी दुनिया को पूरी दुनियाँ की आवाज सुनाई देती। पानी समुद्र से चल कर आता है और बह कर फिर वहीं चला जाता है अगर बहता नहीं तो धरती पर पानी ही पानी होता। खुशबू और बदबू कुछ दूर चल...

च्यवनिकाएँ

च्यवनिकाएँ #3 वारिद याने बादल। वारिद याने पानी देने वाला। प्रकृति की यह अद्भुत संरचना है। इस बादल का पिता है सागर जो इसके जन्म का कारक है माँ इसकी पूरी धरती है जिसकी गोद में यह खेलता है। आकाश इसका रमणस्थल है। हवा के परों पर अठखेलियाँ करता है। सागर ने सूरज की आग को पिया है और अपने तन से शिबी की तरह का दान बादल के रूप में दिया है। सागर ने जन्म दिया पर अपना नाम इसको नहीं दिया अपितु इसे पानी के नाम पर 'वारिद' दिया है। निश्चित रूप से यह सागर का ही टुकड़ा है। यह 'बादल' उस पानी का ही बीच का नाम है जो चला था पानी फिर बन गया पानी।  यह जो बारिश है न, यह बादल की चुअन है। यही चुअन हम पर जीवन का छिड़काव करने आती है। बादल अगर चूता नहीं तो किसी पहाड़ पर स्वयं को उँडेल देता और धरती पर पानी नहीं केवल बाढ़ होती। यह उपकार है बादल का, उपकार है सागर का, उपकार है पवन का, उपकार है, उपकार है तेज का, उपकार है आकाश का। प्रकृति के पाँचों प्रखण्ड जी जान से लगे रहते हैं सागर से हम तक जीवन ढोने में। शायद हमने बादल को इस तरह कभी देखा ही नहीं। बादल सागर के टुकड़े ला कर देता है हमें, जीवन ला कर देता है हमें...

वही तुम वही मैं

एक पौराणिक मिथक पर आधारित कहानी "केशवी और निरुक्त" "वही तुम-वही मैं" केशवी! अजस्र, अप्रतिम और प्रेम की सजीव प्रतिमा हो तुम। जब प्रेम पहला कदम रखता है तो लौटने के सारे रास्ते खुद बन्द कर देता है। यह एकांगी मार्ग पर ही चलता है। इसे नापने में एवरेस्ट छोटा पड़ जाता है, सागर उथला सिद्ध होता है, तुलना के लिये सितारों की दूरी छोटी पड़ जाती है। तुमने शायद अस्थाई तौर पर मान लिया है कि इसे उँगली से रेत पर लिखी गई इबारत की तरह मिटाया जा सकता है। यदि ऐसा हो पाया हो तो पूछ लो स्वयं से ही। सुनयने! प्रेम क्षितिज की सीमा रेखा नहीं मानता, वह जानता है कि जैसे ही वहाँ पहुँचेंगे क्षितिज ही आगे सरक जावेगा। अगर तुम्हें मैं दिखाई नहीं देता हूँ तो तुम धुन्ध में खडी हो, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वहाँ मैं नहीं हूँ। ध्यान दो! इस धुन्ध में तुम तो तुम्हें पूरी तरह दिखाई दे रही हो पर मैं तुम्हारी दृष्टि से ओझल हूँ लेकिन हूँ आसपास ही। तुम्हें शायद पता नहीं कि तुम्हारी बनाई गई इस धुन्ध में तुम्हारी आवाज मुझ तक सफर कर सकती है। हे केशवी, पुकारो! मुझे कुछ भी संज्ञा दे कर पुकारो!! जब तुम पुक...