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Showing posts from June, 2023

वही तुम वही मैं

एक पौराणिक मिथक पर आधारित कहानी "केशवी और निरुक्त" "वही तुम-वही मैं" केशवी! अजस्र, अप्रतिम और प्रेम की सजीव प्रतिमा हो तुम। जब प्रेम पहला कदम रखता है तो लौटने के सारे रास्ते खुद बन्द कर देता है। यह एकांगी मार्ग पर ही चलता है। इसे नापने में एवरेस्ट छोटा पड़ जाता है, सागर उथला सिद्ध होता है, तुलना के लिये सितारों की दूरी छोटी पड़ जाती है। तुमने शायद अस्थाई तौर पर मान लिया है कि इसे उँगली से रेत पर लिखी गई इबारत की तरह मिटाया जा सकता है। यदि ऐसा हो पाया हो तो पूछ लो स्वयं से ही। सुनयने! प्रेम क्षितिज की सीमा रेखा नहीं मानता, वह जानता है कि जैसे ही वहाँ पहुँचेंगे क्षितिज ही आगे सरक जावेगा। अगर तुम्हें मैं दिखाई नहीं देता हूँ तो तुम धुन्ध में खडी हो, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वहाँ मैं नहीं हूँ। ध्यान दो! इस धुन्ध में तुम तो तुम्हें पूरी तरह दिखाई दे रही हो पर मैं तुम्हारी दृष्टि से ओझल हूँ लेकिन हूँ आसपास ही। तुम्हें शायद पता नहीं कि तुम्हारी बनाई गई इस धुन्ध में तुम्हारी आवाज मुझ तक सफर कर सकती है। हे केशवी, पुकारो! मुझे कुछ भी संज्ञा दे कर पुकारो!! जब तुम पुक...

प्रश्न जागरण के

च्यवनिका #3   वे प्रश्न जागरण के जितनी देर मैं जागता हूँ उस पूरे समय में मेरी आँखे, कान दूसरों को जानने, समझने और उनसे बातें करने में लग जाते हैं। हर प्रश्न में, हर व्यवहार में हर घड़ी उठते प्रश्न उन्हें ही देखने परखने के लिये होते हैं। मैं जब आईने के सामने खड़ा होता हूँ तो मैं किसी अन्य से तुलना करने में लग जाता हूँ जैसे वह मेरे साथ खड़ा हो। कहीं से उड़ते हुए प्रश्न मेरे कानों में आ घुसते हैं- "तुम कौन हो, क्या हो, क्यों धरती पर आ टपके हो?" मैं चौंक जाता हूँ और दूसरे कान से वे बेजान हो कर गिर पड़ते हैं। जितनी देर तक के वे भीतर रहे मेरी छटपटाहट बनी रही। वे मेरी सहनशीलता के परे थे। परन्तु ये प्रश्न मुझे मुझसे मिलवा सकते थे, मुझे मैं जानता ही नहीं हूँ वे मेरी पहचान से पहचान करवा सकते थे। वे समुद्र मन्थन के सुमेरू पर्वत थे जो मुझे मथने में सक्षम थे। वे चिन्तन के कच्छप जैसे आधार बन कर आये थे। मेरे भीतर बसे विष जैसे काले रत्न को बाहर निकाल फेंकने में सक्षम थे। अब मन्थन नहीं होगा। अस्मिता की पहिचान के अमृतत्व तक अब नहीं पहुँचा जा सकेगा। क्या इस तू, तुम, वह और वे के महाजाल में "मैं...