वही तुम वही मैं
एक पौराणिक मिथक पर आधारित कहानी "केशवी और निरुक्त" "वही तुम-वही मैं" केशवी! अजस्र, अप्रतिम और प्रेम की सजीव प्रतिमा हो तुम। जब प्रेम पहला कदम रखता है तो लौटने के सारे रास्ते खुद बन्द कर देता है। यह एकांगी मार्ग पर ही चलता है। इसे नापने में एवरेस्ट छोटा पड़ जाता है, सागर उथला सिद्ध होता है, तुलना के लिये सितारों की दूरी छोटी पड़ जाती है। तुमने शायद अस्थाई तौर पर मान लिया है कि इसे उँगली से रेत पर लिखी गई इबारत की तरह मिटाया जा सकता है। यदि ऐसा हो पाया हो तो पूछ लो स्वयं से ही। सुनयने! प्रेम क्षितिज की सीमा रेखा नहीं मानता, वह जानता है कि जैसे ही वहाँ पहुँचेंगे क्षितिज ही आगे सरक जावेगा। अगर तुम्हें मैं दिखाई नहीं देता हूँ तो तुम धुन्ध में खडी हो, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वहाँ मैं नहीं हूँ। ध्यान दो! इस धुन्ध में तुम तो तुम्हें पूरी तरह दिखाई दे रही हो पर मैं तुम्हारी दृष्टि से ओझल हूँ लेकिन हूँ आसपास ही। तुम्हें शायद पता नहीं कि तुम्हारी बनाई गई इस धुन्ध में तुम्हारी आवाज मुझ तक सफर कर सकती है। हे केशवी, पुकारो! मुझे कुछ भी संज्ञा दे कर पुकारो!! जब तुम पुक...