वही तुम वही मैं
एक पौराणिक मिथक पर आधारित कहानी "केशवी और निरुक्त"
"वही तुम-वही मैं"
केशवी!
अजस्र, अप्रतिम और प्रेम की सजीव प्रतिमा हो तुम। जब प्रेम पहला कदम रखता है तो लौटने के सारे रास्ते खुद बन्द कर देता है। यह एकांगी मार्ग पर ही चलता है। इसे नापने में एवरेस्ट छोटा पड़ जाता है, सागर उथला सिद्ध होता है, तुलना के लिये सितारों की दूरी छोटी पड़ जाती है। तुमने शायद अस्थाई तौर पर मान लिया है कि इसे उँगली से रेत पर लिखी गई इबारत की तरह मिटाया जा सकता है। यदि ऐसा हो पाया हो तो पूछ लो स्वयं से ही।
सुनयने! प्रेम क्षितिज की सीमा रेखा नहीं मानता, वह जानता है कि जैसे ही वहाँ पहुँचेंगे क्षितिज ही आगे सरक जावेगा। अगर तुम्हें मैं दिखाई नहीं देता हूँ तो तुम धुन्ध में खडी हो, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वहाँ मैं नहीं हूँ। ध्यान दो! इस धुन्ध में तुम तो तुम्हें पूरी तरह दिखाई दे रही हो पर मैं तुम्हारी दृष्टि से ओझल हूँ लेकिन हूँ आसपास ही। तुम्हें शायद पता नहीं कि तुम्हारी बनाई गई इस धुन्ध में तुम्हारी आवाज मुझ तक सफर कर सकती है।
हे केशवी, पुकारो! मुझे कुछ भी संज्ञा दे कर पुकारो!! जब तुम पुकारोगी तो "मैं हूँ" ऐसा मेरे होने का मुझे बोध भी हो जावेगा।
प्रियतमे! मेरी अस्मिता को पहचान देने वाली हो कर तुमने मेरी सुधियाँ खुद समेट कर कहीं रख दी हैं। क्या इतना सरल-साध्य है- प्रकृति के नैसर्गिक गुणों के पार निकल जाना? सच तो यह है कि भूलने का प्रयास स्मृतियों को और अधिक प्रबल बना देता है।
शुभे! "जग से चाहे भाग ले कोई मन से भाग न पाये।" -
यह जो मन है ना यह तन के पार है, विशुद्ध है, कमल के पत्ते पर ठहरे बिन्दु की तरह निर्लेप है, जिसे हवा नहीं सुखा सकती, किसी भी प्रकार की अशुद्धियाँ कभी छू नहीं पाती है इसे। इसलिये यह कपास जैसा श्वेत है। कितना प्योर है यह? प्यार जो निर्लेप है, प्यार जो अक्षत है, प्यार जो अखण्ड है, हाँ! यही सत्य भी है। सत्य स्वयं सिद्ध होता है उसे सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।
निर्मले! यथार्थ में मैं बोलचाल की भाषा तो पहले से ही जानता था पर तुमने मुझे मौन की भाषा सिखाई है, पढ़ाई है। वह भाषा हाथ से, उँगलियों से, भौंहों से, नयनों से और चेहरे पर चढ़ते-उतरते रंगों की "मननागरी लिपि" में लिखी जाती है और केवल सच्चे और विशुद्ध मन से ही पढ़ी जा सकती है।
सुप्रिये! मुझ से मुझे मिलवा कर कहाँ चली गई हो तुम? कोई हाल पूछता है मुझसे, तुम कैसे हो? मैं अनजाने में ही एक जुमले की तरह कहता हूँ-'मैं पर ठीक हूँ' पर मैं जानता हूँ कि मैं झूँठ बोलता हूँ।
देखो उसे! बहुत ऊँची पहाड़ी पर वहाँ एक मंदिर बन गया है। उसमें देवी प्रतिमा स्थापित हुई अब पहाड़ की पुरानी तलहटी में नीचे खड़े हो कर दर्शन केैसे करूँ मैं उसका?
मैं कहता हूँ कि 'मैं तुम्हें रोज भूलता हूँ तुम्हें' तो मैं फिर से झूँठ बोलता हूँ। पर जिस अलाव में बरसों बरस यह आग नहीं बुझी, जिस चौपाल में यह अलाव बसता है और जिस बरगद की छाँह में इस चौपाल में जीवन का रंगमंच बना हो; इन सब को भूल पाना असंभव है।
विमले! माना कि मुझे चुप रहना अच्छा लगता है, पर सन्नाटे मुझे बिलकुल अच्छे नहीं लगते क्योंकि सन्नाटों का शोर मेरे कान सह नहीं पाते। जब मैं कई टुकड़ों में बँटता हूँ तो कोई कनी वहाँ भी जा गिरी होगी।
अमले! मेरे मन मस्तिष्क के इस बड़े से घर में एक नितान्त एकान्त में एक बन्द कमरा है इसकी दीवारें पुरानी हो गई हैं। दीवार में कुछ दरारें पड़ गई हैं इन दरारों के बीच से वही अतीत झाँकता है। उसकी कुछ किरणों को मैं पकड़ने की कोशिश करता हूँ तो उसका मद्धिम प्रकाश बस उँगलियों को उजली कर देता है और जब मैं उस उजाले को चूमने के लिये उठाता हूँ तो ये उँगलियाँ फिर काली पड़ जाती है। मैं अपने इस बचपने पर अफसोस भी करता हूँ फिर भी उसे जिद्दी बच्चे की तरह बार बार दोहराता हूँ। अतीत काे कौन लौटा सका है।
सुचिते! मैंने सुना यह भी है कि किसी की परछाईं कभी अकेली नहीं रहती पर मैं इसे अकेली क्यों देख रहा हूँ अपने चारों ओर? यह परछाईं मेरी नहीं है, फिर भी मेरे साथ साथ चलती ही रहती है।
सुनिधे! प्यार को जमीन चाहिये इसीलिये मैं जमीन पर खड़ा हूँ। यहाँ से मेरे गिरने का कोई डर नहीं होता। प्यार वाले कभी जमीन नहीं छोड़ सकते तिस पर अगर धरातलों का अन्तर हो जावे तो प्यार हमारे-तुम्हारे खड़े होने के धरातलों का अन्तर सहन नहीं करता। एक बात और; मैं अपने प्यार के भोलेपन से खुश हूँ क्योंकि मैंने अपने विवेक ही को दुलत्ती मार कर कहीं खाई में फेंक दिया है इसलिये तो वह तर्कहीन है। प्यार में जीवन का नहीं मेरा और मेरी "स्वयं मैं" का समर्पण हुआ है। जो मैंने तो अपनी ओर से कर दिया है।
वही मैं
-अकिंचन 'निरुक्त'
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