अनन्त आकाश
अनन्त आकाश
आकाश एक नहीं आकाश और भी हैं। जैसे कि चिदाकाश, महाकाश, घटाकाश ये बाह्याकाश है लेकिन एक आकाश तुम्हारे भीतर भी है। बाहर के आकाश में सारे भौतिक तत्व हैं, चमत्कार हैं, विस्तार है और जीवन का निन्यानवे प्रतिशत समय तुम इसमें बिताते हो जब तक पता चले तब तक बचे हुए एक प्रतिशत को जान नहीं पाते हो और भीतर के आकाश को बिना जाने निकल लेते हो।
इस भीतर के आकाश में तुमने अगर किसी को साथ ले कर जाने की कोशिश की तो तुम प्रवेश द्वार पर ही रोक दिये जाओगे। दूसरी बात और भी है कि सारे साधन संसाधन भी ले जाने की कोशिश की तो वे भी तुम्हें तुरन्त बाहर खींच लावेंगे। वहाँ पैदल जाना है, अकेले जाना है, निर्विचार जाना है, अनाभिलाष जाना है, उन्मुक्त हो कर जाना है।
निर्मानमोहा: जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5 श्रीमद्भगवद्गीता।।
जिनका मान और मोह निवृत्त हो गया है, जिन्होंने संगदोष को जीत लिया है, जो अध्यात्म में स्थित हैं जिनकी कामनाएं निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दु:ख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त हो गये हैं, ऐसे सम्मोह रहित ज्ञानीजन उस अव्यय पद को प्राप्त होते हैं।।
इस आकाश में महाशून्य है, अनतिरेक आनन्द है। बहुत आगे निकल गये तो कबीर का बताया 'लय' है जिसे समझने के लिये इसे प्रलय कह सकते हो। प्रलय अर्थात् जब कुछ नहीं केवल वह बचता है जो अविनाशी है, अव्यय है, अनन्त है, पूर्ण है। योगी इसे समाधि कहता है। यहाँ न यात्री बचता है और न यात्रा ही। जो शेष रहता है वह स्वयं अशेष है। तत्वमसि।
रामनारायण सोनी
२४.१०.२३
Comments
Post a Comment