च्यवनिका #1
च्यवनिका
(अर्थात् बूँद बूँद टपकन)
बूँद #1
टूटता हुआ तारा, आकाश में चमकती बिजली कितनी ही क्षणिक क्यों न हो पर वह दृश्य तो हमारे अन्तर्पट पर लकीरें छोड़ जाती है। इसी तरह तुम आये कुछ पल के लिये मेरे जीवन में और देखो मैं कितना बदल गया हूँ। आकाश में तारा जो टूटा एक चमकती लकीर सी पगडण्डी बना कर छोड़ गया, मेरी मंजिल की राह बन गई है अब वह। बिजली जो चमकी बादलों में, मैंने इस गहन अन्धकार में भी देख लिया कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ ?
हाँ, मेरा प्रियतम अथवा मेरा गुरू हो तुम। वह छूटी हुई चमक मुझ में गुरूसत्ता के रूप में विद्यमान है। तुम व्यक्ति नहीं हो सकते, तुम मेरे भीतर का प्रकाश बन कर बस गये हो। प्रकाश आत्मा का, प्रकाश जो मुझे तमस के महाब्धि में गिरने से बचायगा, प्रकाश जो जीवन में आने वाली निराशाओं से बचाएगा। यह प्रकाश मेरी जिजीविषा का उत्प्रेरण है। प्रकाश जो परमात्मा का ही है जो तुम्हारे दर्पण से हो कर मुझ तक सहज रूप से पहुँच रहा है।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।श्रीमद्भगवद्गीता 13/18।।
मैं उस सद्गुरू को प्रणाम करता हूँ।
रामनारायण सोनी
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