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च्यवनिका
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कौन है जो क्षितिज के पार गया है?
क्षिति का अर्थ है- जमीन, धरती, पृथ्वी। एक और अर्थ भी सुना है-निवास स्थान। जो धरती से जन्मा है वह क्षितिज है या हम जहाँ रहते हैं वहाँ से क्षितिज वह काल्पनिक किन्तु सत्य आभासित होने वाली परिधि है जिसके पार हमारी दृष्टि नहीं जा सकती है। क्षितिज के उस पार अथवा हमारे क्षितिज में रह रहे आदमी का भी अपना क्षितिज है। उसके क्षितिज से हमारा क्षितिज टकराता नहीं है। कमाल की बात है कि आदमी चलता है तो हाथ में पकड़े छाते जैसा अपना क्षितिज उसके अपने साथ साथ चलता है।
कभी कभी लगता है अगर परिधि का यह सीमांकन नहीं होता तो मीलों दूर तक हमें दिखाई देता। प्रकृति ने इस तरह की कई सीमाएँ तय की हैं जैसे अगर हम पूरे जोर से चिल्लावें तो यह आवाज कुछ दूर चल कर मर जाती है। अगर आवाज कुछ दूर चल कर न मरती तो यूक्रेन में बम्बार्डमेन्ट करने वाली मिसाइलों की गड़गड़ाहट यहाँ तक आ कर हमारे कान फोड़ देती। पूरी दुनिया को पूरी दुनियाँ की आवाज सुनाई देती। पानी समुद्र से चल कर आता है और बह कर फिर वहीं चला जाता है अगर बहता नहीं तो धरती पर पानी ही पानी होता। खुशबू और बदबू कुछ दूर चल कर मर जाती है नहीं तो समझ लो क्या हो जाता। मतलब हमारे आँख नाक, कान की प्रति रक्षा की और सृष्टि क्रम को व्यस्थित करने के लिये प्रकृति ने कठोर नियम बनाये है।
श्रीदुर्गासप्तशती के मन्त्र में आता है "या देवि सर्व भूतेषु स्मृति रूपेण संस्थिता" और "या देवि सर्व भूतेषु भ्रान्ति रूपेण संस्थिता"
हमारे शारीरिक संस्थान में स्मृति होने का वरदान है पर बचपन से अभी तक की सारी की सारी घटनाओं का रिकार्ड रहना नहीं होता है। अगर ऐसा होता तो हमारे दिमाग में एक ट्रेन्चिंग ग्राउन्ड होता। इसलिये भूलने का एक अभिशाप हमें वरदान के रूप में मिला हुआ है कि पूरे जीवन की कुछ घटनाओं के कुछ अंश ही हमें स्मृति में रहते हैं। सृष्टिकर्ता की अनगिनत ऐसी अनुकम्पा प्रकृति के माध्यम से अनुशासित ढंग से चल रही है। यह अहसास हमें होते रहना चाहिये।
रामनारायण सोनी
३.७.२३
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