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Showing posts from July, 2023

च्यवनिका #1

च्यवनिका  (अर्थात् बूँद बूँद टपकन) बूँद #1  टूटता हुआ तारा, आकाश में चमकती बिजली कितनी ही क्षणिक क्यों न हो पर वह दृश्य तो हमारे अन्तर्पट पर लकीरें छोड़  जाती है। इसी तरह तुम आये कुछ पल के लिये मेरे जीवन में और देखो मैं कितना बदल गया हूँ। आकाश में तारा जो टूटा एक चमकती लकीर सी पगडण्डी बना कर छोड़ गया, मेरी मंजिल की राह बन गई है अब वह। बिजली जो चमकी बादलों में, मैंने इस गहन अन्धकार में भी देख लिया कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ ?  हाँ,  मेरा प्रियतम अथवा मेरा गुरू हो तुम। वह छूटी हुई चमक मुझ में गुरूसत्ता के रूप में विद्यमान है। तुम व्यक्ति नहीं हो सकते, तुम मेरे भीतर का प्रकाश बन कर बस गये हो। प्रकाश आत्मा का, प्रकाश जो मुझे तमस के महाब्धि में गिरने से बचायगा, प्रकाश जो जीवन में आने वाली निराशाओं से बचाएगा। यह प्रकाश मेरी जिजीविषा का उत्प्रेरण है। प्रकाश जो परमात्मा का ही है जो तुम्हारे दर्पण से हो कर मुझ तक सहज रूप से पहुँच रहा है। ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।श्रीमद्भगवद्गीता 13/18।। मैं उस सद्गुरू को प्रणाम ...

#4

च्यवनिका  #4 कौन है जो क्षितिज के पार गया है? क्षिति का अर्थ है- जमीन, धरती, पृथ्वी। एक और अर्थ भी सुना है-निवास स्थान। जो धरती से जन्मा है वह क्षितिज है या हम जहाँ रहते हैं वहाँ से क्षितिज वह काल्पनिक किन्तु सत्य आभासित होने वाली परिधि है जिसके पार हमारी दृष्टि नहीं जा सकती है। क्षितिज के उस पार अथवा हमारे क्षितिज में रह रहे आदमी का भी अपना क्षितिज है। उसके क्षितिज से हमारा क्षितिज टकराता नहीं है। कमाल की बात है कि आदमी चलता है तो हाथ में पकड़े छाते जैसा अपना क्षितिज उसके अपने साथ साथ चलता है।  कभी कभी लगता है अगर परिधि का यह सीमांकन नहीं होता तो मीलों दूर तक हमें दिखाई देता। प्रकृति ने इस तरह की कई सीमाएँ तय की हैं जैसे अगर हम पूरे जोर से चिल्लावें तो यह आवाज कुछ दूर चल कर मर जाती है। अगर आवाज कुछ दूर चल कर न मरती तो यूक्रेन में बम्बार्डमेन्ट करने वाली मिसाइलों की गड़गड़ाहट यहाँ तक आ कर हमारे कान फोड़ देती। पूरी दुनिया को पूरी दुनियाँ की आवाज सुनाई देती। पानी समुद्र से चल कर आता है और बह कर फिर वहीं चला जाता है अगर बहता नहीं तो धरती पर पानी ही पानी होता। खुशबू और बदबू कुछ दूर चल...

च्यवनिकाएँ

च्यवनिकाएँ #3 वारिद याने बादल। वारिद याने पानी देने वाला। प्रकृति की यह अद्भुत संरचना है। इस बादल का पिता है सागर जो इसके जन्म का कारक है माँ इसकी पूरी धरती है जिसकी गोद में यह खेलता है। आकाश इसका रमणस्थल है। हवा के परों पर अठखेलियाँ करता है। सागर ने सूरज की आग को पिया है और अपने तन से शिबी की तरह का दान बादल के रूप में दिया है। सागर ने जन्म दिया पर अपना नाम इसको नहीं दिया अपितु इसे पानी के नाम पर 'वारिद' दिया है। निश्चित रूप से यह सागर का ही टुकड़ा है। यह 'बादल' उस पानी का ही बीच का नाम है जो चला था पानी फिर बन गया पानी।  यह जो बारिश है न, यह बादल की चुअन है। यही चुअन हम पर जीवन का छिड़काव करने आती है। बादल अगर चूता नहीं तो किसी पहाड़ पर स्वयं को उँडेल देता और धरती पर पानी नहीं केवल बाढ़ होती। यह उपकार है बादल का, उपकार है सागर का, उपकार है पवन का, उपकार है, उपकार है तेज का, उपकार है आकाश का। प्रकृति के पाँचों प्रखण्ड जी जान से लगे रहते हैं सागर से हम तक जीवन ढोने में। शायद हमने बादल को इस तरह कभी देखा ही नहीं। बादल सागर के टुकड़े ला कर देता है हमें, जीवन ला कर देता है हमें...