च्यवनिकाएँ

च्यवनिकाएँ #3

वारिद याने बादल। वारिद याने पानी देने वाला। प्रकृति की यह अद्भुत संरचना है। इस बादल का पिता है सागर जो इसके जन्म का कारक है माँ इसकी पूरी धरती है जिसकी गोद में यह खेलता है। आकाश इसका रमणस्थल है। हवा के परों पर अठखेलियाँ करता है। सागर ने सूरज की आग को पिया है और अपने तन से शिबी की तरह का दान बादल के रूप में दिया है। सागर ने जन्म दिया पर अपना नाम इसको नहीं दिया अपितु इसे पानी के नाम पर 'वारिद' दिया है। निश्चित रूप से यह सागर का ही टुकड़ा है। यह 'बादल' उस पानी का ही बीच का नाम है जो चला था पानी फिर बन गया पानी। 
यह जो बारिश है न, यह बादल की चुअन है। यही चुअन हम पर जीवन का छिड़काव करने आती है। बादल अगर चूता नहीं तो किसी पहाड़ पर स्वयं को उँडेल देता और धरती पर पानी नहीं केवल बाढ़ होती। यह उपकार है बादल का, उपकार है सागर का, उपकार है पवन का, उपकार है, उपकार है तेज का, उपकार है आकाश का। प्रकृति के पाँचों प्रखण्ड जी जान से लगे रहते हैं सागर से हम तक जीवन ढोने में। शायद हमने बादल को इस तरह कभी देखा ही नहीं।
बादल सागर के टुकड़े ला कर देता है हमें, जीवन ला कर देता है हमें। बादल की चुअन को संस्कृत में च्यवन कहते हैं। इस च्यवन में से हमारे हिस्से में जो आई है वह 'च्यवनिका' है। जो जीवन देता है वह अमृत है। इसलिये 'च्यवनिका' वह अमृत बिन्दु है जो उस अनन्त परमात्मा के सागर चले बादलों की ही चुअन है। 

विनीत
रामनारायण सोनी
२.७.२३

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