जिन्दगी की नाप-जोख
जिन्दगी की नाप-जोख
अतीत की कन्दराओं में उकेरे भित्तिचित्रों में भी कई आख्यान उभरते हैं। इन आख्यानों में छुपे होते हैं कुछ रहस्य। इनमें समाहित हैं जीवन से जुड़े यथार्थ के धरातल, खट्टे-मीठे, कषाय-तिक्त और संगतियों-विसंगतियों के भिन्न भिन्न आस्वादन। इस कहानी में रास्ते हैं, मील के पत्थर हैं, पड़ाव हैं और बहते समय का प्रवाह है। थकन है, अहसास है, भूख है, प्यास है कुछ अँधेरे तो कुछ उजास भी हैं। जो बीत गई वह कहानी तो है पर यही इतिहास भी है।
यह जिन्दगी साँप की तरह गुजर गई पर पीछे जो छूट गई वह लकीर ही इसकी कहानी है। वक्त भी गुजरता जाता है, घड़ी की सुईयाँ सरकती रहती है। प्रकट में हम इसे समय को मापने का यंत्र कहते हैं पर काल इन पैमानों में बँध सकता है। बस चाल ही पता चल सका कि हम कर्ता भी हैं और दृष्टा भी हम ही हैं।
जहाँ धुआँ है वहाँ आग होगी, जहाँ उजास है वहाँ कहीं पास ही अन्धकार होगा। नैसर्गिक गुण धर्मों से सज्जित ज्वालाएँ ऊर्जा की परम स्रोत है पर लकड़ियाँ अपना उत्सर्ग कर के उन्हें उत्पन्न करती है। उम्र की कहानी भी इसी तरह जीवन की कई विसंगतियों का अद्भुत रसायन है। हम चल रहे है, चल कर यहाँ तक आए हैं ओर चलते चलते अतीत के आइने में झाँक झाँक कर देखते रहते हैं। जीवन मूल्यों का पता धुएँ से नही आग की ज्वलन्त अर्चियों से चलता है। ये अर्चियाँ कर्म और कर्मफल का निर्माण करती है।
वस्तुतः जिन्दगी का आसव उसका कर्मफल ही है। इसलिये माप भी वही है।
रामनारायण सोनी
१३. ५ . २६
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