प्रश्न जागरण के
च्यवनिका #3
वे प्रश्न जागरण के
जितनी देर मैं जागता हूँ उस पूरे समय में मेरी आँखे, कान दूसरों को जानने, समझने और उनसे बातें करने में लग जाते हैं। हर प्रश्न में, हर व्यवहार में हर घड़ी उठते प्रश्न उन्हें ही देखने परखने के लिये होते हैं। मैं जब आईने के सामने खड़ा होता हूँ तो मैं किसी अन्य से तुलना करने में लग जाता हूँ जैसे वह मेरे साथ खड़ा हो। कहीं से उड़ते हुए प्रश्न मेरे कानों में आ घुसते हैं- "तुम कौन हो, क्या हो, क्यों धरती पर आ टपके हो?" मैं चौंक जाता हूँ और दूसरे कान से वे बेजान हो कर गिर पड़ते हैं। जितनी देर तक के वे भीतर रहे मेरी छटपटाहट बनी रही। वे मेरी सहनशीलता के परे थे।
परन्तु ये प्रश्न मुझे मुझसे मिलवा सकते थे, मुझे मैं जानता ही नहीं हूँ वे मेरी पहचान से पहचान करवा सकते थे। वे समुद्र मन्थन के सुमेरू पर्वत थे जो मुझे मथने में सक्षम थे। वे चिन्तन के कच्छप जैसे आधार बन कर आये थे। मेरे भीतर बसे विष जैसे काले रत्न को बाहर निकाल फेंकने में सक्षम थे। अब मन्थन नहीं होगा। अस्मिता की पहिचान के अमृतत्व तक अब नहीं पहुँचा जा सकेगा।
क्या इस तू, तुम, वह और वे के महाजाल में "मैं" तक पहुँच पाना अलक्षित हो जावेगा। मेरा अवचेतन बस इन्हीं से भरा पड़ा है। सुना है कि अन्धे कमरे से अँघेरे को हटाने के लिये अँधेरे का उलीचना उपाय उपाय नहीं है वरन् वहाँ अपना प्रज्जवलित दीप रखना पड़ेगा। आत्मदीप। दृष्टि को अन्तर्दृष्टि बनाना होगी। वे दिवंगत प्रश्न मैं कौन हूँ, क्या हूँ, क्यों जन्मा हूँ? के रूप में परिवर्धित होते ही परिदृश्य बदल जावेंगे।
रामनारायण सोनी
३०.०६.२३
Comments
Post a Comment